1.ज़िन्दगी से जूझता हुआ मैं हारा सा , थका सा ..
कुछ दूर चला , फिर भूल चला , भटका सा .
न नींद , न सपने , न मंजिल और नहीं अपने ,
बढ़ता जा रहा बिन बदल बिन छाँव , कुछ बुझा कुछ जला सा .
2.ज़िन्दगी से जूझता हुआ मैं हारा सा , थका सा ......
रात का उजाला वही जो दिन का अँधेरा ,
कितने अरमानो की लौ जली ,कभी सूरज , कभी रात के तारे सा .
बदला नहीं मौसम और न ही समय ,
नीरस दृश्य ,कुछ बंजर कुछ शमशान सा ...
3.ज़िन्दगी से जूझता हुआ मैं हारा सा , थका सा ......
अभी तोह दम भर न रुका , फिर चल पड़ा ,
दर्द कंधे पर लिए ,लडखडाता सा .
बचा है तो सिर्फ समय के ख़त्म होने का इंतज़ार
बुझते हुए दीये में अन्खरी तेल बूँद सा ...
4.ज़िन्दगी से जूझता हुआ मैं हारा सा , थका सा ......
Written on the eve of last exam in Glasgow on the night of 16th july,09...because someone did smthing not so gud and i didn’t feel like studying anymore...next day we had class 1 naval architecture exam..everybody was studying except me.
nice expression of your thoughts... but that someone must have given you happier moments at times, so waiting for a poem in which those moments will be reflected ...
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