Wednesday, December 8, 2010

निर्मल...

निर्मल  सपनो  की  बस्ती  से  निकल  आया  हूँ ,
मलिन  असत्य  के  शहर  में .
सुन्दर  उजली  दुनिया  से  दामन  छूटा  तोह  पाया ,
खुद  को  इस  अँधेरे  जंगल  में .
रात  कटती  न  जहाँ  बिना  सहारे ,
न  दिखते  सूरज , चाँद  या  तारे ....
किसको  गिनकर  रात  गुज़ारूँ .
रातभर  मैं , यह  सोचकर  जागूँ ..
आँख  लगी  तोह  खुद  को  पाया ,
सपनो  की  उसी  बस्ती  में ..
जहाँ  का  सूरज  कभी  न  ढलता .
समय  भी  थोडा  सुस्ता  कर  चलता 
दूर  क्षितिज  में  चाँद  भी  जलता 
और  मेरा  स्वप्न  है  पलता .

निर्मल 
=====23/07/02

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