निर्मल सपनो की बस्ती से निकल आया हूँ ,
मलिन असत्य के शहर में .
सुन्दर उजली दुनिया से दामन छूटा तोह पाया ,
खुद को इस अँधेरे जंगल में .
रात कटती न जहाँ बिना सहारे ,
न दिखते सूरज , चाँद या तारे ....
किसको गिनकर रात गुज़ारूँ .
रातभर मैं , यह सोचकर जागूँ ..
आँख लगी तोह खुद को पाया ,
सपनो की उसी बस्ती में ..
जहाँ का सूरज कभी न ढलता .
समय भी थोडा सुस्ता कर चलता
दूर क्षितिज में चाँद भी जलता
और मेरा स्वप्न है पलता .
निर्मल
=====23/07/02
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