Wednesday, December 8, 2010

मेरा जहाज़ ...

पानी  की  एक-एक  बूँद , जुडकर बना  समंदर 
उस  समंदर  पर  मेरा  जहाज़ , डोलता  इठलाता 
चलता  है  इधर  से  उधर , समेटे  हुए  हमें
एक  शरीर  जैसे  आत्मा  को  लेकर 
एक  एक  आदमी  से  बने  इस  संसार  में 
कभी  पता  है  शांति , सुख  इस  गहराई  में , और 
कभी  गुस्सा  और  अशांति  उन  लहरों  से ...
व्याकुल  होता  है  प्रिया  रुपी  नदी  से  मिलने  पर 
सांसें  लेता  है  ज्वार  भाटों  सी 
देता  है  शरण  जैसे  सीप  का  मोती ...


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